छत का पानी जान का दुश्मन

सचिन शर्मा

इंदौर। शहरों में वर्षा जल संग्रहण के नाम पर हो रही 'रूफ (छत) वॉटर हारवेस्टिंग देर-सबेर यहाँ की जनता और भू-जल दोनों के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। अगर विषय विशेषज्ञों की मानें तो लोगों की अज्ञानता ही आगे चलकर उनकी बीमारियों का मुख्य कारण बनेगी। शहर के कई लोग अपने घरों की छतों पर जमा होने वाले पानी को सीधे पाइप के जरिए अपने बोरवेल में डालकर उसे रिचार्ज करने की खतरनाक कोशिश में लगे हुए हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दशक बाद बोरिंग से आने वाला पानी पीने लायक नहीं रह जाएगा।
केन्द्र और प्रदेश सरकारों द्वारा रेन वॉटर हारवेस्टिंग के लिए अनेक जनजागरण अभियान चलाए गए। लोगों को अपने ट्यूबवेल और बोरवेल रिचार्ज करने की तरह-तरह से सलाह दी गई। बारिश के पानी को सहेजने की बात लोगों को ठीक भी लगी, लेकिन जल्दबाजी में वे ऐसा काम कर रहे हैं जिसके दूरगामी परिणाम अत्यंत घातक होंगे।

एसजीएसआईटीएस कॉलेज (इंदौर का इंजीनियरिंग कॉलेज) में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख प्रो. आरके श्रीवास्तव इस मुद्दे पर कहते हैं कि रूफ वॉटर हारवेस्टिंग किसी भी तरह से पानी की समस्या का समाधान नहीं कर सकता। अगर देश के सारे घरों की छतों का पानी इकट्ठा कर लिया जाए तो भी पीने के पानी की सिर्फ 2 प्रश आवश्यकता पूरी होगी। इसलिए सतर्कता बरतनी चाहिए। वे कहते हैं कि लोगों की छतें गंदी रहती हैं। कुत्ते-बिल्लियों की पहुँच भी वहाँ आसान होती है। ऐसे में उनके पेशाब या अन्य गंदगी का वर्षाजल में मिलना कोई मुश्किल नहीं। प्रो. श्रीवास्तव के मुताबिक लोगों को समझना चाहिए कि उनका बोरवेल सिर्फ एक गड्ढा भर नहीं है बल्कि उसके तल में एक पूरी नदी बहती है जो एक बार प्रदूषित हो गई तो फिर उसे स्वच्छ करना असंभव होगा। उन्होंने बताया कि कई उद्योग भी 'रेन वॉटर हारवेस्टिंग' कर रहे हैं। यह घातक है क्योंकि इससे रसायनों के भू-जल में पहुँचने की आशंका है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इसके लिए कदम उठाना चाहिए।

रिचार्ज का तरीका
जमीन के अंदर एक्वाफर लेयर (यहाँ पानी नदी की तरह बहता है) होती है। इसे साफ बनाए रखना चाहिए क्योंकि अगर यह गंदी हुई तो कई लाख लोगों को लेने के देने पड़ जाएँगे। इसे स्वच्छ रखने के लिए बोरवेल सिस्टम को दुरुस्त रखना होगा। इसके लिए बोरवेल के आसपास 14-15 फुट गहरे गड्ढे बनाने चाहिए, इसके बाद काली मिट्टी की परत खत्म हो जाती है। इन गड्ढों में पत्थर, बोल्डर, रेत आदि डालकर भरना चाहिए और पानी का बहाव इन्हीं की ओर करना चाहिए। अगर इस तरह से पानी नीचे जाएगा तो वह स्वच्छ हो जाएगा।

नगर निगम का ध्यान दिलवाएँगे
इस मुद्दे पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी श्री एए मिश्रा कहते हैं कि वे इस बात पर नगर निगम का ध्यान दिलवाएँगे। खासकर उद्योगों द्वारा की जा रही वॉटर हारवेस्टिंग पर विशेष ध्यान दिया जाएगा क्योंकि वो सिर्फ खानापूर्ति कर रहे हैं।

धार जिले में दिख चुकी है बानगी

पाँच वर्ष पूर्व धार जिले के कुछ गाँवों में पीलिया और हैजा फैला था। शासन ने तीन सदस्यीय एक जाँच दल को वहाँ भेजा था। इसमें पीएचई के मुख्य अभियंता, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक वैज्ञानिक और एसजीएसआईटीएस कॉलेज के विषय विशेषज्ञ एक सहायक प्राध्यापक को भेजा गया था। उस दल में गए इंजीनियरिंग कॉलेज के विषय विशेषज्ञ श्री सुनील अजमेरा ने बताया कि उस प्रकोप के पीछे वर्षा जल संग्रहण ही मुख्य कारण निकला। किसानों ने खेतों में जमा पानी कुओं में सीधे मिला लिया। उस पानी में फसलों में छिड़के गए कीटनाशक भी मिल गए। ग्रामीणों ने जब उस पानी को पीया तो उन्हें पीलिया और हैजा जैसी बीमारियों ने घेर लिया।

दिल्ली व इंदौर की मिट्टी में है फर्क
दिल्ली पठारी क्षेत्र पर बसा है। इस क्षेत्र में मुरम यानी सैंडी सॉइल है। इसकी पोरोसिटी बहुत होती है। यह पानी को आसानी से नीचे की ओर बह जाने देती है। यही कारण है कि भारी बारिश में भी दिल्ली में पानी जमा नहीं होता। इंदौर की मिट्टी काली है, जो पानी को नीचे नहीं उतरने देती। कोर क्षेत्र में पानी रिसने की संभावना खत्म कर दी जाती है। इस मिट्टी से लोग पानी नीचे नहीं उतार पाते और उसे पाइप के सहारे सीधे ही नीचे उतार देते हैं। यही बात उन्हें खतरे के और करीब ले जा रही है।
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1 टिप्पणियाँ:

  1. बहती सोच को झटका देती पोस्ट ....... वास्तव में इस और ध्यान देना जरुरी है

    on 14 जून 2010 को 3:37 am